ग्वालियर। जल संसाधन(इरीगेशन), लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी(पीएचई) और नगर निगम के अधिकारियों के लिए सोने की नदी बनी 'स्वर्ण रेखा' में 20 साल पहले डाली गई सीवर लाइन में तकनीकी खामी है। उसकी लेवलिंग ठीक है न मोटाई(डाया)। इसी कारण शुरू से ही वह बार-बार चोक हो रही है और सीवर ओवरफ्लो होकर नदी में बह रहा है। पिछले दिनों निरीक्षण के लिए ग्वालियर आए प्रदेश के मुख्य तकनीकी परीक्षक(सीटीई) ने यह खुलासा किया है। लाइन डालने के 20 साल बाद हुए इस खुलासे से हड़कंप मच गया है। कारण यह कि स्वर्ण रेखा के सुंदरीकरण, साफ पानी बहाने और नाव चलाने के नाम पर अब तक 70 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं। स्मार्ट सिटी योजना से अब फिर 50 करोड़ खर्च करने का ताना-बाना बुना जा रहा है। निगम प्रशासक एमबी ओझा ने सीवर समस्या के समाधान के लिए 13 सदस्यीय समिति गठित की है।
सीटीई ने किया था निरीक्षण
प्रदेश के सभी तकनीकी विभागों के कार्यों में तकनीकी की जांच के लिए सामान्य प्रशासन विभाग के अधीन मुख्य तकनीकी परीक्षक(सतर्कता) काम करता है। वर्तमान में सीटीई पद पर सीपी अग्रवाल पदस्थ हैं। वे पिछले दिनों ग्वालियर में अमृत योजना के कार्यों तथा स्वर्ण रेखा नदी में सीवर लाइन का मुआयना करने आए थे। उन्होंने स्वर्ण रेखा में डली सीवर लाइन में तकनीकी खामी होने की बात कहते हुए पीएचई के मुख्य अभियंता(सीई) को पत्र भेजा था। चूंकि स्वर्ण रेखा प्रोजेक्ट पीएचई का ही था। अब यह नगर निगम की देखरेख में है। इसलिए सीई ने निगम को यह पत्र भेजा और जानकारी मांगी। पत्राचार के बाद जब पड़ताल हुई तो एक खुलासा यह हुआ कि पीएचई ने अब तक निगम को उपयोगिता प्रमाण-पत्र ही नहीं दिया है। कार्य पूरा होने और ड्राइंग, डिजाइन सहित अन्य दस्तावेज सौंपे जाने के बाद ही यह प्रमाण-पत्र दिया जाता है। लेकिन पीएचई ने निगम को यह दस्तावेज 20 में अब तक नहीं दिए। सीई के पत्र पर जब निगम ने तथ्य जुटाए तो सीटीई की रिपोर्ट को सही पाया। इस आधार पर निगम ने पीएचई को जवाब दे दिया कि स्वर्ण रेखा नदी में डाली गई सीवर लाइन में तकनीकी खामी है।
देखें, नदी से 'सोना' कैसे निकाल रहे अधिकारी
हनुमान बांध से शर्मा फार्म तक 13.65 किमी के क्षेत्र में इस नदी में साफ पानी बहाने और नाव चलाने के सपने देखे गए।
नदी के सीमेंट कांक्रीटीकरण व दोनों और बाउंड्रीवॉल के लिए वर्ष 2000 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी के कार्यकाल में 46 करोड़ की योजना मंजूर की गई। इसमें से कुछ राशि स्वर्ण रेखा नदी को पक्का करने पर खर्च किए गए। नदी में सीवर लाइन भी डाली गई।
पहले चरण में योजना का काम अधूरा रह गया तो उसे पूरा करने के लिए तत्कालीन जल संसाधन मंत्री अनूप मिश्रा के समय 2004-05 में वर्ल्ड बैंक से 1900 करोड़ की वाटर रीचाचिर्ग योजना के तहत 39 करोड़ की योजना मंजूर हुई।
नदी से नाला बनी स्वर्ण रेखा में साफ पानी और बोट क्लब के रूप में पिकनिक स्पाट तैयार करने का काम 2008 से शुरू हुआ और 2011 में खत्म हो गया। इसके तहत 23 करोड़ से सीवर के साथ पीएचई कॉलोनी में सीवेज पंपिंग स्टेशन स्थापित किया गया। फिर भी सीवर का पानी नदी में आता रहा तो निगम को 12 करोड़ का बजट सीवर लाइन डालने के लिए दिया गया। लेकिन लश्कर के छोटे-बड़े 84नालों से नदी में गंदा पानी आना बंद नहीं हुआ।
इस प्रोजेक्ट के तहत आखिर 2014 में बारादरी से लक्ष्मीबाई प्रतिमा के पास बने पुल तक नाव(बोट) चलना शुरू हुई। लेकिन लगातार गंदे पानी के कारण उसे अगले ही साल बंद करना पड़ा।
स्वच्छता सर्वेक्षण से पहले 2018 में सफाई में लगा था पूरा निगम
स्वच्छता सर्वेक्षण की टीम के आने से पहले तत्कालीन कलेक्टर राहुल जैन व निगमायुक्त विनोद शर्मा के नेतृत्व में नगर की सभी मशीनें, क्षेत्राधिकारी व सफाई अमला नदी में उतारा गया था। एक सप्ताह तक चले अभियान में डीजल-पेट्रोल पर ही करीब 20 लाख रुपये खर्च कर नदी की सफाई कराई थी। लेकिन दो माह बाद ही फिर उसमें सीवर का गंदा पानी बहना लगा।
जल स्तर बढ़ाने के नाम पर लाखों रुपये खर्च
भू-जल स्तर बढ़ाने के लिए शहर की लाइफ लाइन माने जाने वाली स्वर्ण रेखा नदी को पक्की(सीमेंटेंट) कर जो भूल की गई उसके दुष्परिणाम सामने आए। इस पर अप्रैल 2018 में इस नदी में 8-8 फीट गहरे वाटर रीचार्जिंग पिट बनाने का काम शुरू किया गया। प्रत्येक पिट में 3 फीट गिट्टी, 3 फीट ईंट के टुकड़े तथा 2 फीट बजरी डाली जाने की बात कही गई। अधिकारियों ने दावा है कि नदी में 500 स्थानों पर पिट बनाए। इस कार्य में भी करीब 10 लाख रुपये खर्च किए गए।
विदेशियों को दिखाए थे सपने, बताया था प्लान
जून 2018 में केन्द्र सरकार ने बेल्जियम के लूबिन शहर के प्रतिनिधि मंडल को ग्वालियर भेजा। स्मार्ट सिटी और नगर निगम अधिकारियों ने उन्हें नदी को शहर का सबसे प्रमुख आकर्षण का केन्द्र बनाने की प्लानिंग बताई। विदेशियों को नदी का पुराना वैभव लौटाने, दोनों ओर सड़क बनाने, पेड़ लगाने, लाइटिंग कर प्रमुख पिकनिक स्पॉट बनाने के हर बार सपने दिखाए गए। लेकिन अब भी हालात जस के तस हैं। योजना कागजों से बाहर नहीं आ सकी है।इनका कहना है
सीटीई ने स्वर्ण रेखा नदी में डली सीवर लाइन में तकनीकी खामी बताई है। हमने भी परीक्षण किया तो यह बात सही पाई। इसलिए पीएचई को सीई कार्यालय को इससे अवगत करा दिया है।
आरएलएस मौर्य, अधीक्षण यंत्री ननि